Panchaang Puraan

Utpanna Ekadashi in Preeti Yoga and Manas Yoga Lord Vishnu and Lakshmi are worshiped with this ritual read ekadashi katha

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भौतिक (सांसारिक) एवं अभौतिक (आध्यात्मिक) सुखों को प्रदान करने वाला व्रत है। पौराणिक धारणा के अनुसार मनुष्य के जीवन में भौतिक एवं अभौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए सद्कर्मो, सद्विचारों, धर्म कर्म, अध्यात्म तथा व्रत आदि का विशेष महत्व है। जहां व्रत का वैज्ञानिक अर्थ शरीर की शुद्धि के लिए वहीं भौतिक शुद्धि के साथ-साथ आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्व भी है। व्रतों में एकादशी व्रत को उत्तम व्रत माना जाता है। साल में कुल 24 एकादशी व्रत होता है। प्रत्येक का अपना विशेष महत्व है। मार्ग शीर्ष एकादशी के दिन पहले जाने वाले ब्रांड को एकादशी व्रत कहते हैं।

इस वर्ष एकादशी व्रत का मान सबके लिए 2022 दिन रविवार को है। एकादशी तिथि 19 दिन शनिवार को सुबह 7 बजे 7 बजकर मिनट से शुरू होकर 20 दिन रविवार को दिन में 7:37 तक व्याप्त रहेंगे। इस दिन नक्षत्र नक्षत्र पूर्व से रात को 10 बजकर 54 मिनट तक। पूरा दिन प्रीति योग तथा मानस योग का मान रहेगा । व्रत का पारणा द्वादशी तिथि 21 नवंबर दिन सोमवार को प्रातः काल 7:37 बजे तक किया जाएगा।


आय एकादशी व्रत करने की पूजा विधि:-
1:- एकादशी व्रत नियम दशमी तिथि से ही शुरू हो जाते हैं। जो लगभग 36 घंटे बाद द्वादशी तिथि में पारण के साथ समाप्त हो जाता है।
2:- जो लोग एकादशी व्रत करते हैं उन्हें दशमी तिथि में सूर्य से पहले ही सात्विक भोजन कर लेना चाहिए।
3:- व्रत करने वाले एकादशी तिथि में प्रातः काल स्नान आदि दैनिक कार्य से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें।
4:- पूजा स्थल पर श्री हरि विष्णुजी के सम्मुख घृत का दीपक जलाकर ध्यान देना चाहिए।
5:- जो भी पूजन की सामग्री उपलब्ध हो उसे क्रमशः अर्पित करते हुए पूजा करनी चाहिए।
6:- बाद में पूजन के एकादशी व्रत का महात्म्य पढ़ना या प्राप्त होना चाहिए।
7:- एकादशी तिथि में पूरे दिन व्रती रहते हुए श्रीहरि का ध्यान करते हुए “ॐ नारायणाय नमः” या किसी भी मंत्र का जप करते रहना चाहिए।
8:-शाम को गोधुल समय भी घृत का दीपककर जलाकर श्री हरि विष्णु एवं माता लक्ष्मी का ध्यान पूजन करना चाहिए।
9:- अगले दिन प्रातः काल उसी मार्ग के साथ श्रीहरि विष्णु एवं माता लक्ष्मी का ध्यान पूजन करना चाहिए।
10:- एकादशी व्रत के दौरान सुयोग्य ब्राह्मण से सत्य नारायण व्रत कथा का श्रवण करना तथा ब्राह्मण या घिनौनी को ग्रहण शुभ फल प्रदायक होता है।
11:- ब्राह्मण एवं शाखाओं को उपहार, दान-दक्षिणा देकर विदा करने के उपरान्त व्रत का पारण करना श्रेष्ठ फल प्रदायक होता है।
इस प्रकार यह श्रेष्ठ व्रत पूर्ण होता है। व्रत के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन अत्यावश्यक होता है।

आय एकादशी की पौराणिक कथा :-
सतयुग में एक बार मुरु नामक राक्षस ने विश्व पर विजय प्राप्त कर देवताओ के राजा इंद्र को ऋणी बना लिया। तब सभी देवता गण भगवान भोलेनाथ की शरण में पहुंचे। सदाशिव भोले नाथ ने विश्व को श्री हरि विष्णु जी के पास जाने की सलाह दी। उसके बाद सभी देवता गण श्री हरि विष्णु जी के पास जाकर अपनी सारी व्‍यथा सुनी। ये सब सुनने के बाद श्रीहरि विष्णु जी ने सभी राक्षसों को तो परास्त कर दिया, लेकिन दैत्य राजा मुरु वहां से भाग निकला। श्रीहरि विष्णु ने दैत्य मुरु को भागता देख उन्हें जाने दिया और स्वयं बद्री नाथ अजीब की छुट्टी में विश्राम करने लगे। उसके कुछ दिनों बाद दैत्य मुरु भगवान विष्णु जी को मारने के इरादे से वहां पहुंचे। तब श्री हरि विष्णु जी के शरीर से एक स्त्री की उत्पत्ति हुई। यह हुआ कि उसने मुरु देवता को मार डाला और दुनिया को भय से मुक्त कर दिया। भगवान श्रीहरि विष्णु के अंश से होने के कारण श्री विष्णु जी ने वचन दिया कि कन्या को वरदान देते हुए कहा कि संसार के मोह माया के जाल में उलझे हुए सभी जनों को, जो मेरे विमुख हो गए हैं, उन्हें मुझ तक लाने में आप रहेंगी और आपकी पूजा- अर्चना और भक्ति करने वाले भक्त हमेशा समस्त भौतिक एवं आध्यात्मिक सुख से परिपूर्ण सदगति को प्राप्त करेंगे। श्री हरि विष्णु से गुण होने के कारण इस व्रत का नाम आय पड़ा

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