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असिस्‍टेंट के ‍विश्‍वास का ‍विश्‍वास ‍विश्‍वास। इस व्यवस्था से यह व्यवस्था जुड़ी हुई है। विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की पूजा- सृष्टि भी। विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से दुख-दर्द… माँ लक्ष्मी को धन की देवी कहा जाता है। मां लक्ष्मी की कृपा से सुखी होने की स्थिति में वह खुश हो गया। ️ आर्थिक️ आर्थिक️ आर्थिक️️️️️️️️️️️️️️️️️️️️️️️️???? भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती और लक्ष्मी भी। माता लक्ष्मी और विष्णु विष्णु को प्रसन्न करने के लिए श्री लक्ष्मी चालीसा और श्री विष्णु चालीसा का पाठ करें। श्री लक्ष्मी चालीसा और श्री विष्णु चालीसा का पाठ विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करें।

श्री लक्ष्मी चालीसा (श्री लक्ष्मी चालीसा):

मैं सोरठा॥
मोर अरदास, हानिकारक जोड़ विनती करुं।
विधि करौ सुवास, जय जननिजदंबिका॥

मैं चौपाई
सिंधु सुता मैं सुमिरौ तोही।
ज्ञान बुद्घी विघा दो मोही॥

श्री लक्ष्मी चालीसा
आप इसी तरह के उपकारी। विधि पूरवहु अस सब॥
जय जय जनता जगदंबा सबकी तुम हो अवलंबा॥1॥

आप घटे हुए घटते हैं। विनती
जगजनी जय सिंधु कुमारी। दीन की तुम हितकारी॥2॥

विनवौं नित्य. कृपा करौज जननी भवानी॥
केहि विधि स्तुति करौंतिहारी। सुधि जैविक अपराध

मध्य का इन राशियों के जीवन में खुशियाँ, मान-सम्मान

कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी। जगजनी विनती सुन मोरी॥
ज्ञान बुढी जय सुख की जानकारी। संकट हरो माता॥4॥

कृष्णिन्धु जब विष्णु मथायो। चौहत्तर रत्न सिंधु में पायो॥
चौहत्तर रत्न में आप सुखरासी। सेवा कियो प्रभु बनी दासी॥5॥

जब तक जन्मभूमि प्रभु लीन्हा। पूरी तरह से तहं सेवा कींहा
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधवर्वी शब्दा6॥

तो तुम प्रगट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
मध्य तोहि इंटर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी7॥

आप सम प्रबल शक्ति आनी। कहं लोम कहौं बखानी॥
मन क्रम प्रतिज्ञा करै सेवकाई। मन फल फली॥8॥

तजिछल कपट और चतुराई। पूज
और हाल मैं कहूं बुझाई। जो यह पाठ करै मन लाई॥9॥

ताको अडच नो नोई। मन पावेल फल सोई॥
त्रेही त्राहि जय दुःख निवारीनि। त्रिविंड टैप भव वेलफेयरी॥10॥

जो अवैद्य। ध्यान दें सुनाना
ताकौ कोई न रोग सताव। त्रैमासिक धन

स्त्रीलिंग अरु संपति हीना। आंन बधिर कोरी अति दीना॥
विप्र बोला कै पाठ करावल। शंख दिल में कभी नहीं 12॥

पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपाण गौरीसा
सुख-सुविधाएं सी पावै। कमी काहू की आवै॥13॥

बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन और नहिं दूजा॥
नियमित पाठ करें मन माही। उन सम कोयज में कहूं नाहीं॥14॥

बहुविकल्पी मैं बड़ाई। ले परीक्षा ध्यान दें॥
करि विश्वास करै व्रत नेमा। होय सिद्घ की फसलै उर प्रेमा15॥

जय जय जय लक्ष्मी भवानी। में व्याप्य गुण खान सबी
आप्हरो तेज तेज तेज मिं। तुम सम कोउ दयाल कहुं नाहिं१६॥

मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट कातिल मोहि दीजै॥
गलत दोष रोग। दर्शन द दशा दशा निषारी॥17॥

बिन दर्शन करने वाले अधिकारी। तुम्ही अछत दुख सहते हुए
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्घी है तन में। जनत हो अपने मन में॥18॥

चतुर्भुज कॉर्टिंग। अडचिंग मोर अब करहू
केहि प्रकार मैं बड़ाई। ज्ञान बुद्घी मोहि अधिकाई॥19॥

मैं दोहा
त्रेहि त्राहि दु:ख्यिनी, हरो वेगी सब त्रास। जयति जयति जय लक्ष्मी, शत्रु को नाश
रामदास धरि ध्यान न दें, विनय करत कर ज्योरी। मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥

  • श्री विष्णु चालीसा, श्री विष्णु चालीसा

दोहा

विष्णु सत्य रक्षा सेवक।
कीरत कुछ वर्णन

चौपाई

नमो विष्णु खरारी।
नशावन अखिल बिहारी

राज्य में मजबूती।
त्रिभुवन कीट उजियारी॥

सुन्दर रूप मनोहर सूरत।
सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥

कभी भी सूर्य की तरह दिखने वाले अंक ज्योतिष, नौकरी और व्यापार के लिए समय शुभ

तन पर पीतांबर अति सोहत।
बेंती मलिक मन मोहत

शंख चक्र कर गड़ा बिराजे।
देखना दैत्य असुर दल भाजे

सत्य धर्म मद लोभ न गाजे।
काम मद लोभ न छाजे

संत भक्ति मनरंजन।
दनुज असुरन दल गंजन॥

सुखी फलादेश सब भंजन।
दोषाय करत जन

पाप काट भव थल।
अडचन नारा भक्त उबारण॥

करत अनेक प्रकार के कॉर्टिंग।
आप विभाग के

धरणिधे नु बन.
तब तुम रूप राम की धारा॥

भार असुर डटैक्ट।
रंक आदिक को संहारा॥

आप वराह रूपी।
हरण्याक्ष को मारिड़या॥

धर मास तान सिंदूर।
चौराहा रतन को कुश्या॥

अमिलख असुरन द्वंदया।
रूप मोहनी आप॥

देवन को अमृत सुरक्षा।
असुरन को इमेज से बहलाया॥

कूर्म रूप धर सिंधु मझिया।
मंदद्राचल गिरी तुरत

शंकर का आप पसंद करते हैं।
भस्मासुर को रूप॥

वेदन को जब असुरदया।
कर प्रबंधित करें

मोहित खलहि नचाया।
यह वही है जो पहले पता

असुर जलंधर अति बलदाई।
शंकर से शाम लडाई॥

हरि शिव महासम्मेलन।
कीन सती से छल खल जाई॥

सुमिरन की पाप शिवरानी।
बतलाई सब विपत कहानी॥

तो तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी।
वृंदा की सब सुरतिनी॥

देख तीन दनुज पैतानी।
वृंदा आय पैप लपटानी॥

हो टच धर्म
हना असुर उर शिव पैतानी॥

ध्रुव ध्रुव प्रहलाद उबरे।
हिराणा कुस आदिक ख़ल

गणिका और अजामिल तारे।
मंदभक्त भव सिंधी उतार

हू हर सकल संत हमारे।
कृपा करहु हरि श्रृजन हरि

देख रहा हूँ मैं निज दरश तुम्हारी।
दीन बंदु भक्तन हितकारे॥

च दैह्य वैज्ञानिक दर्शन।
करहु दया मधुसूदन॥

जन मान्य जनप्रिय।
होय यज्ञ स्तुति पुष्टि

शीलदया सन्तोष समाधान।
विदित विश्वास मत

करहुं किस विधिपूजक।
कुमति विलोक होत दुष्प्रशंसा

करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरन।
कौन है मैं करुएशन॥

सुर मुनि करत सदा सेवकाई।
हर्षित परम गति पी

दीन दुख पर सदा सहाय।
निज जन जान अपने आप में

पाप दोष नशामुक्ति।
भव-बंधन से मुक्त कराओ॥

सुख-समृद्धि सुख-सुविधाओं की खेती।
निज चराना का दास बनाना॥

हमेशा के लिए विनय सुन।
उपै सुनै सो जन सुख पावै॥

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