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Azadi Ka Amrit Mahotsav : World Of Sardar Patel Opens With The Key Of The Grocery Seller – आजादी का अमृत महोत्सव: किराना वाले की चाबी से खुलती है सरदार पटेल की दुनिया…

सार

किराना वाले की चाबी से खुलती है सरदार पटेल की दुनिया… कोठरी में पटेल की तस्वीर के ऊपर गुजराती में लिखा है-अखंड भारतना शिल्पी सरदार पटेल। मकान अपने करीब डेढ़ सौ साल पुराने स्वरूप को अखंड रखे हुए है। पढ़ें ये रिपोर्ट सरदार पटेल के जन्म स्थल नडियाद से…

सरदार पटेल का देसाई वगो स्थित जन्मस्थान।
– फोटो : Amar Ujala

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आजादी के अमृत महोत्सव के समय हम पीछे मुड़कर देखें कि देश को बनाने में जिन्होंने अपना जीवन दे दिया, उनकी विरासत को हमने कितना सहेजा है? उनकी स्मृतियों से हम कितनी शक्ति लेते हैं? इस महत्त्वपूर्ण अभियान के तहत अमर उजाला ने अपने प्रतिनिधियों को देश भर में भेजा। ‘कुछ चर्चे-कुछ लोग’ और ‘शहीदों के गांव’ की शृंखला में नई कड़ी है- ‘सितारों की जमीन’। इसके तहत पहली रिपोर्ट सरदार वल्लभ भाई पटेल के जन्म स्थान से।

वल्लभभाई पटेल किस मकान में जन्मे…किस ठीहे पर पहली बार आंखें खोलीं…किस कमरे या बरामदे में खेलते-कूदते थे…कहां शैतानियां करते थे..यह सब देखना-समझना और अनुभव करना है तो इस सब दिग्दर्शन से पहले पड़ोसी दुकानदार रजनीभाई बेलाभाई देसाई के दर्शन करने होंगे। रजनीभाई कोई हस्ती या पटेल के खानदानी नहीं, तीन मकान छोड़कर किराने की छोटी-सी दुकान चलाते हैं और उस मकान की चाबी उनके पास ही रहती है। 

उनकी चाबी से ही पटेल की दुनिया खुलती और दिखती है। यूं तो रजनीभाई का सरदार पटेल से ताले-चाबी भर का ही रिश्ता है लेकिन सरदार के इतिहास के साथ उनका नाम भी जुड़ गया है। रजनीभाई न मिलें तो दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु इस ऐतिहासिक अध्याय से अपरिचित रह जाएं। भारतीय प्रशासनिक सेवा के जन्मदाता वल्लभभाई पटेल के वे मानद सिविल सर्वेंट हैं।

गुजरात की राजधानी अहमदाबाद से दक्षिण दिशा में करीब 60 किलोमीटर दूर खेड़ा जिले का प्रशासनिक केंद्र है नडियाद। भीड़भाड़ भरे व्यावसायिक रूप लिए नडियाद के देसाई वगो (मोहल्ला) की रिहाइशी पहचान किसी पुरातन इलाके की तरह मिलीजुली है, यानी छोटे-बड़े मकान हैं तो बीच-बीच में रोजमर्रा की जरूरतों वाली दुकानें भी। अपने नाना के करीब 75 फुट में बने मकान की एक आठ बाई आठ की कोठरी में झावेरीभाई और लाडबाई की चौथी संतान वल्लभभाई ने जन्म लिया था। 

मकान के दरवाजे पर किसी जमाने की जंग लगी छोटी सी तख्ती पर गुजराती में दर्ज है-घर नंबर 160, वार्ड नंबर 11, नडियाद नगरपालिका। बुलंद शख्सियत वाले वल्लभभाई झावेरीभाई पटेल का यह पहला छोटा-सा पता है। इसे विडंबना भी मान सकते हैं कि जाति-पात के धुर विरोधी रहे सरदार के जन्मस्थान की पहचान के साथ देसाइयों का मोहल्ला जुड़ा है।

इसी कोठरी में एक कोने में उनके बचपन का लकड़ी का झूला पड़ा है। चारों तरफ की दीवारों पर उनके गौरवशाली राजनीतिक आंदोलनों की खिड़की खोलती तस्वीरें हैं। उस जमाने का पत्थर का फर्श आज भी सलामत है। दूसरे कोने में एक छोटी सी लकड़ी की मेज पर पटेल की मढ़ी हुई फोटो नुमाया है। छतें पुरानी लकड़ी और खपरैल की हैं, दीवारों पर प्लास्टर के पैबंद हैं। पटेल की तस्वीरों के बड़े से कोलाज पर ऊपर गुजराती में लिखा है-अखंड भारतना शिल्पी सरदार पटेल। मकान अपने करीब डेढ़ सौ साल पुराने स्वरूप को अखंड रखे हुए है।

इस ऐतिहासिक जगह तक पहुंचने का रास्ता पटेल के दुष्कर कार्यों जैसा ही है। मुख्य बाजार से करीब पौन किलोमीटर अंदर संकरी गलियों में पूछ-पूछकर ही आना पड़ता है। रास्ते में कहीं कोई संकेतक नहीं। बमुश्किल पहुंचने पर जन्मस्थल पर ताला पड़ा मिला। बगल का दरवाजा खटखटाने पर एक अधेड़ उम्र की महिला निकली। यह बताने पर कि बगल वाले मकान (पटेल के जन्मस्थल) में जाना है, यहां क्या है। इस पर उसका जवाब था.. मैं नई किरायेदार हूं, मुझे नहीं पता, कभी गई नहीं.. और फिर उसने रजनीभाई की दुकान की तरफ इशारा कर दिया।

जन्मस्थल के सामने सड़क के बीचोबीच गांधी जी की प्रतिमा स्थापित है। सामने की दीवार पर सुविचारों के लिए बने दो बड़े ब्लैक बोर्ड खाली पड़े थे, उनकी दशा बता रही थी कि शायद उन पर कभी कुछ लिखा ही नहीं गया। मानो देसाई वगो में विचारों की कमी हो। तिराहे पर बने इस मकान से चौथी राह यहां मौसमी जमावड़ा लगाने वाले नेताओं के लिए निकलती है।  

किराना दुकानदार रजनीभाई बेलाभाई देसाई (63) की दुकान जन्मस्थल से चार मकान छोड़कर है। बताते हैं कि जब कोई आता है तो कमरा खोल देते हैं। इससे पहले कब मकान खोला था, इस सवाल पर बोले कि करीब 15 दिन पहले। तब जन आशीर्वाद यात्रा लेकर मंत्री देवसिंह चौहान आए थे। जन्मस्थान के सामने की गली में रहने वाले हरीशभाई (67) बताते हैं कि उनके पिताजी बताया करते थे कि बड़े आदमी बनने के बाद भी वल्लभभाई का अपनी ननिहाल में आना-जाना और आसपास वालों से मिलना जुलना बना रहा। 

जन्मस्थल के ठीक बगल में अपना फ्लैट बनवा रहीं प्रथिता गौरांग देसाई (32) बताती हैं कि 31 अक्तूबर (जन्मदिन) और 15 दिसंबर (पुण्यतिथि) पर मकान खुलता है, कार्यक्रम होते हैं। मकान मालिक लोग बाहर रहते हैं, आते-जाते नहीं, उनको कभी यहां देखा नहीं। अर्से बाद मकान खुलने की आहट पाकर सामने रहने वाली वृद्धा कावेरीबेन कौतुहलवश निकल आईं। 

बातचीत शुरू हुई तो बताने लगीं..जब कभी नाते-रिश्तेदारी से बच्चे आते हैं तो उन्हें दिखाती और बताती हूं कि यहीं पैदा हुए थे वल्लभभाई। सामने से गुजरी सड़क पर छह मकान छोड़कर पूर्व केंद्रीय मंत्री दिनशा पटेल का पैतृक आवास है। यह शायद पड़ोसी प्रेम ही है कि वे सरदार पटेल की यादों को संजोने में जुटे हैं। पटेल ने इस मकान में बचपन के कुछ साल बिताए। जब पढ़ने-लिखने की बारी आई तो यहां से करीब 40 किलोमीटर दूर अपने पैतृक स्थान करमसद चले गए। 

शुरुआती पढ़ाई करमसद, पेटलाड और बोरसद में हुई। करमसद अब आणंद जिले में है। पहले यह खेड़ा जिले का ही हिस्सा था। बताते हैं कि पटेल की जन्मतिथि का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है। जब पटेल मैट्रिक की परीक्षा देने वाले थे तो उन्होंने खुद ही अपनी यह जन्मतिथि पहली बार दर्ज की थी। पटेल ने मैट्रिक अपनी इसी ननिहाल से बमुश्किल एक किलोमीटर दूर के एक सरकारी स्कूल से किया था। तब पूरे जिले में मैट्रिक तक की पढ़ाई का यही एकमात्र स्कूल था।

इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण या देखरेख के लिए सरकार के कोई प्रयास नहीं दिखते। मकान मालिक यहां रहते नहीं और पुरातत्व विभाग या हेरिटेज महकमे ने इसके अधिग्रहण की कोशिश नहीं की। कमाने-खाने के लिए परदेस चले गए किसी आम आदमी के त्याज्य मकान जैसा ही दिखता है, बस बाहर पटेल की फोटो और उनका जन्मस्थल बताने वाली इबारत इसके विशिष्ट होने की पहचान देती है। बाहर आमदरफ्त किसी आम मध्यवर्गीय मोहल्ले जैसी ही है।

नडियाद स्थित सरदार पटेल के जर्जर हालत वाले जन्मस्थल को देखते हैं तो लगता है, काश इस जगह को भी कोई नर्मदा किनारे आकाश छूती ‘स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी’ की तरह अपने संरक्षण में लेता और प्रेरणास्थल में बदल पाता।

इतिहासकार डा. रिजवान कादरी बताते है कि बाॅम्बे महानगरपालिका में 12 दिसंबर 1918 में महिलाओं की सदस्यता का प्रस्ताव पेश हुआ तो पुरुषों ने यह कहते हुए विरोध किया कि महिलाओं को घर-गृहस्थी, चूल्हा-चौका तक ही खुद को रखना चाहिए। यह प्रस्ताव खारिज हो गया।

पिछली सदी की शुरुआत में यूं तो देश भर में अंग्रेजों का आभिजात्य कल्चर प्रभुत्ववान वर्ग को तेजी से लुभा रहा था लेकिन वह महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में आने देने के प्रति पाखंडी था। तब माय कल्चर इज एग्रीकल्चर से गाहे-बगाहे अपना परिचय कराने वाले सरदार पटेल इस जड़ता और सोच के खिलाफ आगे आए और तमाम मुखालफत और अड़ंगे पार करते हुए महिलाओं की पालकी सदन में लाकर ही उन्होंने दम लिया। तब महिला सशक्तीकरण का जो शंखनाद किया, उसकी गूंज आज तलक महसूस की जा रही है।

1916 में अहमदाबाद नगर पालिका के पार्षद के तौर पर उन्होंने पालिकाध्यक्ष को नोटिस भेजते हुए बाॅम्बे डिस्ट्रिक्ट एक्ट में संशोधन के लिए अहमदाबाद नगरपालिका में प्रस्ताव पेश किया और देश की सभी नगरपालिकाओं ने महिलाओं के प्रति भेदभाव वाले कानून को बदलने की आवाज उठाई। सरदार की जोरदार दलीलों से सहमत होकर प्रस्ताव आमराय से पारित कर सरकार को भेज दिया गया। हालांकि इस पर अमल में करीब सात साल लग गए और जब सरदार तीसरी बार नगरपालिका अध्यक्ष बने तो 1926 में इसे लागू करवा सके।

सरदार पटेल ने 1935 में अपने बड़े भाई विठ्ठलभाई पटेल की याद में खेड़ा जिले में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला। यह पांचवीं तक था। अब इंटर तक है। नाममात्र की फीस पर 1200 छात्राएं यहां पढ़ती हैं। एक शिष्या निरंजना बेन ने बारदोली में करीब 50 साल पहले ऐसा ही स्कूल खोला। इसी स्कूल में पढ़ीं, यहीं प्रिंसिपल और अब ट्रस्टी बनीं भगवतीबेन पंड्या बताती हैं कि पटेल 1938 से मृत्युपर्यंत स्कूल सोसाइटी के चेयरमैन रहे थे। 40 साल तक मोरारजी देसाई चेयरमैन रहे।

मैं तीस करोड़ का ट्रस्टी हूं। सभी की रक्षा मेरी जिम्मेदारी है। किसी भी तरह का हमला बर्दाश्त नहीं होगा। गांधी जी से कहा है कि आपका रास्ता अच्छा लेकिन मै वहां तक जा नहीं पाता। -सरदार पटेल (संग्रहालय से)

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आजादी के अमृत महोत्सव के समय हम पीछे मुड़कर देखें कि देश को बनाने में जिन्होंने अपना जीवन दे दिया, उनकी विरासत को हमने कितना सहेजा है? उनकी स्मृतियों से हम कितनी शक्ति लेते हैं? इस महत्त्वपूर्ण अभियान के तहत अमर उजाला ने अपने प्रतिनिधियों को देश भर में भेजा। ‘कुछ चर्चे-कुछ लोग’ और ‘शहीदों के गांव’ की शृंखला में नई कड़ी है- ‘सितारों की जमीन’। इसके तहत पहली रिपोर्ट सरदार वल्लभ भाई पटेल के जन्म स्थान से।

वल्लभभाई पटेल किस मकान में जन्मे…किस ठीहे पर पहली बार आंखें खोलीं…किस कमरे या बरामदे में खेलते-कूदते थे…कहां शैतानियां करते थे..यह सब देखना-समझना और अनुभव करना है तो इस सब दिग्दर्शन से पहले पड़ोसी दुकानदार रजनीभाई बेलाभाई देसाई के दर्शन करने होंगे। रजनीभाई कोई हस्ती या पटेल के खानदानी नहीं, तीन मकान छोड़कर किराने की छोटी-सी दुकान चलाते हैं और उस मकान की चाबी उनके पास ही रहती है। 

उनकी चाबी से ही पटेल की दुनिया खुलती और दिखती है। यूं तो रजनीभाई का सरदार पटेल से ताले-चाबी भर का ही रिश्ता है लेकिन सरदार के इतिहास के साथ उनका नाम भी जुड़ गया है। रजनीभाई न मिलें तो दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु इस ऐतिहासिक अध्याय से अपरिचित रह जाएं। भारतीय प्रशासनिक सेवा के जन्मदाता वल्लभभाई पटेल के वे मानद सिविल सर्वेंट हैं।

गुजरात की राजधानी अहमदाबाद से दक्षिण दिशा में करीब 60 किलोमीटर दूर खेड़ा जिले का प्रशासनिक केंद्र है नडियाद। भीड़भाड़ भरे व्यावसायिक रूप लिए नडियाद के देसाई वगो (मोहल्ला) की रिहाइशी पहचान किसी पुरातन इलाके की तरह मिलीजुली है, यानी छोटे-बड़े मकान हैं तो बीच-बीच में रोजमर्रा की जरूरतों वाली दुकानें भी। अपने नाना के करीब 75 फुट में बने मकान की एक आठ बाई आठ की कोठरी में झावेरीभाई और लाडबाई की चौथी संतान वल्लभभाई ने जन्म लिया था। 

मकान के दरवाजे पर किसी जमाने की जंग लगी छोटी सी तख्ती पर गुजराती में दर्ज है-घर नंबर 160, वार्ड नंबर 11, नडियाद नगरपालिका। बुलंद शख्सियत वाले वल्लभभाई झावेरीभाई पटेल का यह पहला छोटा-सा पता है। इसे विडंबना भी मान सकते हैं कि जाति-पात के धुर विरोधी रहे सरदार के जन्मस्थान की पहचान के साथ देसाइयों का मोहल्ला जुड़ा है।

इसी कोठरी में एक कोने में उनके बचपन का लकड़ी का झूला पड़ा है। चारों तरफ की दीवारों पर उनके गौरवशाली राजनीतिक आंदोलनों की खिड़की खोलती तस्वीरें हैं। उस जमाने का पत्थर का फर्श आज भी सलामत है। दूसरे कोने में एक छोटी सी लकड़ी की मेज पर पटेल की मढ़ी हुई फोटो नुमाया है। छतें पुरानी लकड़ी और खपरैल की हैं, दीवारों पर प्लास्टर के पैबंद हैं। पटेल की तस्वीरों के बड़े से कोलाज पर ऊपर गुजराती में लिखा है-अखंड भारतना शिल्पी सरदार पटेल। मकान अपने करीब डेढ़ सौ साल पुराने स्वरूप को अखंड रखे हुए है।

इस ऐतिहासिक जगह तक पहुंचने का रास्ता पटेल के दुष्कर कार्यों जैसा ही है। मुख्य बाजार से करीब पौन किलोमीटर अंदर संकरी गलियों में पूछ-पूछकर ही आना पड़ता है। रास्ते में कहीं कोई संकेतक नहीं। बमुश्किल पहुंचने पर जन्मस्थल पर ताला पड़ा मिला। बगल का दरवाजा खटखटाने पर एक अधेड़ उम्र की महिला निकली। यह बताने पर कि बगल वाले मकान (पटेल के जन्मस्थल) में जाना है, यहां क्या है। इस पर उसका जवाब था.. मैं नई किरायेदार हूं, मुझे नहीं पता, कभी गई नहीं.. और फिर उसने रजनीभाई की दुकान की तरफ इशारा कर दिया।

जन्मस्थल के सामने सड़क के बीचोबीच गांधी जी की प्रतिमा स्थापित है। सामने की दीवार पर सुविचारों के लिए बने दो बड़े ब्लैक बोर्ड खाली पड़े थे, उनकी दशा बता रही थी कि शायद उन पर कभी कुछ लिखा ही नहीं गया। मानो देसाई वगो में विचारों की कमी हो। तिराहे पर बने इस मकान से चौथी राह यहां मौसमी जमावड़ा लगाने वाले नेताओं के लिए निकलती है।  

किराना दुकानदार रजनीभाई बेलाभाई देसाई (63) की दुकान जन्मस्थल से चार मकान छोड़कर है। बताते हैं कि जब कोई आता है तो कमरा खोल देते हैं। इससे पहले कब मकान खोला था, इस सवाल पर बोले कि करीब 15 दिन पहले। तब जन आशीर्वाद यात्रा लेकर मंत्री देवसिंह चौहान आए थे। जन्मस्थान के सामने की गली में रहने वाले हरीशभाई (67) बताते हैं कि उनके पिताजी बताया करते थे कि बड़े आदमी बनने के बाद भी वल्लभभाई का अपनी ननिहाल में आना-जाना और आसपास वालों से मिलना जुलना बना रहा। 

जन्मस्थल के ठीक बगल में अपना फ्लैट बनवा रहीं प्रथिता गौरांग देसाई (32) बताती हैं कि 31 अक्तूबर (जन्मदिन) और 15 दिसंबर (पुण्यतिथि) पर मकान खुलता है, कार्यक्रम होते हैं। मकान मालिक लोग बाहर रहते हैं, आते-जाते नहीं, उनको कभी यहां देखा नहीं। अर्से बाद मकान खुलने की आहट पाकर सामने रहने वाली वृद्धा कावेरीबेन कौतुहलवश निकल आईं। 

बातचीत शुरू हुई तो बताने लगीं..जब कभी नाते-रिश्तेदारी से बच्चे आते हैं तो उन्हें दिखाती और बताती हूं कि यहीं पैदा हुए थे वल्लभभाई। सामने से गुजरी सड़क पर छह मकान छोड़कर पूर्व केंद्रीय मंत्री दिनशा पटेल का पैतृक आवास है। यह शायद पड़ोसी प्रेम ही है कि वे सरदार पटेल की यादों को संजोने में जुटे हैं। पटेल ने इस मकान में बचपन के कुछ साल बिताए। जब पढ़ने-लिखने की बारी आई तो यहां से करीब 40 किलोमीटर दूर अपने पैतृक स्थान करमसद चले गए। 

शुरुआती पढ़ाई करमसद, पेटलाड और बोरसद में हुई। करमसद अब आणंद जिले में है। पहले यह खेड़ा जिले का ही हिस्सा था। बताते हैं कि पटेल की जन्मतिथि का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है। जब पटेल मैट्रिक की परीक्षा देने वाले थे तो उन्होंने खुद ही अपनी यह जन्मतिथि पहली बार दर्ज की थी। पटेल ने मैट्रिक अपनी इसी ननिहाल से बमुश्किल एक किलोमीटर दूर के एक सरकारी स्कूल से किया था। तब पूरे जिले में मैट्रिक तक की पढ़ाई का यही एकमात्र स्कूल था।

इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण या देखरेख के लिए सरकार के कोई प्रयास नहीं दिखते। मकान मालिक यहां रहते नहीं और पुरातत्व विभाग या हेरिटेज महकमे ने इसके अधिग्रहण की कोशिश नहीं की। कमाने-खाने के लिए परदेस चले गए किसी आम आदमी के त्याज्य मकान जैसा ही दिखता है, बस बाहर पटेल की फोटो और उनका जन्मस्थल बताने वाली इबारत इसके विशिष्ट होने की पहचान देती है। बाहर आमदरफ्त किसी आम मध्यवर्गीय मोहल्ले जैसी ही है।


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